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Class 12 Political Science Notes-Exam Preparation

राजनीतिक विज्ञान (CBSE) 12 क्लास बोर्ड परीक्षा 

Class 12 Political Science Notes

 

अध्याय 1 : शीत युद्ध का दौर (Bipolarity of the World )

पाठ का उद्देश्य

इस अध्याय के अध्ययन के बाद विद्यार्थी—

-शीत युद्ध का अर्थ समझ सकेंगे।

-शीत युद्ध के कारणों और परिणामों का विश्लेषण कर सकेंगे।

-द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Bipolar World) को समझ सकेंगे।

-गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की आवश्यकता एवं महत्व बता सकेंगे।

-बोर्ड परीक्षा एवं प्रतियोगी परीक्षाओं के महत्वपूर्ण प्रश्न हल कर सकेंगे।

 

द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945)

द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों (Allied Powers-अमेरिका-फ्रांस -ब्रिटेन -USSR ) की विजय हुई। इसके बाद विश्व

की राजनीति में दो महाशक्तियाँ उभरकर सामने आईं—

1 – संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) – पूँजीवादी व्यवस्था का समर्थक।

2 – सोवियत संघ (USSR) – साम्यवादी व्यवस्था का समर्थक।

इन दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष युद्ध नहीं हुआ, लेकिन राजनीतिक, आर्थिक, वैचारिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा कई

दशकों तक चलती रही। इसे शीत युद्ध (Cold War) कहा गया।

शीत युद्ध (Cold War) क्या था?

परिभाषा

शीत युद्ध वह स्थिति थी जिसमें अमेरिका और सोवियत संघ के बीच प्रत्यक्ष युद्ध नहीं हुआ, लेकिन दोनों एक-दूसरे

को कमजोर करने के लिए राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य और वैचारिक प्रतिस्पर्धा करते रहे।

सरल भाषा में

“बिना गोलियाँ चलाए, डर, दबाव, हथियारों और प्रचार के माध्यम से लड़ा गया युद्ध ही शीत युद्ध कहलाता है।”

Q. शीत युद्ध क्यों हुआ?

 

1. विचारधारा का संघर्ष

अमेरिका सोवियत संघ
पूँजीवाद साम्यवाद
निजी उद्योग

(नागरिकों को अपना उद्योग लगाने और लाभ कमाने की आज़ादी )

सरकारी नियंत्रण

(सरकार मालिक, नागरिकों को सीधा लाभ नहीं, सरकार द्वारा लाभ को जनता पर खर्च करने का नियम   )

लोकतंत्र

(हर बार नए लोगों को लोगों द्वारा सरकार बनाने का अधिकार )

एकदलीय शासन

(जनता या नागरिकों को सरकार चुनने का अधिकार नहीं )

 

2. शक्ति की होड़

दोनों महाशक्तियाँ विश्व पर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहती थीं।

3. परमाणु हथियारों की दौड़

1945 के बाद दोनों देशों ने परमाणु हथियारों का तेजी से निर्माण किया।

4. सैन्य गठबंधन

अमेरिका

  • NATO (1949)
  • SEATO
  • CENTO

सोवियत संघ

  • Warsaw Pact (1955)

 

द्विध्रुवीय विश्व (दो पक्षों में बँटी दुनिया )

(Bipolar World)

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व दो गुटों में बँट गया—

पश्चिमी गुट

पूर्वी गुट

-अमेरिका

-ब्रिटेन

-फ्रांस

-पश्चिमी जर्मनी

-सोवियत संघ

-पोलैंड

-हंगरी

-चेकोस्लोवाकिया

 

शीत युद्ध की प्रमुख घटनाएँ

1. बर्लिन नाकाबंदी (1948–49)

सोवियत संघ ने पश्चिमी बर्लिन जाने वाले रास्ते बंद कर दिए। अमेरिका ने हवाई मार्ग से आवश्यक वस्तुएँ पहुँचाईं।

2. कोरियाई युद्ध (1950–53)

उत्तर कोरिया (USSR समर्थक) और दक्षिण कोरिया (USA समर्थक) के बीच युद्ध हुआ।

3. क्यूबा मिसाइल संकट (1962)

सोवियत संघ ने क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात कीं। अमेरिका ने विरोध किया। दुनिया परमाणु युद्ध के बहुत करीब पहुँच गई, लेकिन अंततः समझौते से संकट टल गया।

महत्वपूर्ण तथ्य: इसे शीत युद्ध का सबसे खतरनाक चरण माना जाता है।

4. वियतनाम युद्ध

अमेरिका ने दक्षिण वियतनाम का समर्थन किया जबकि उत्तर वियतनाम को सोवियत संघ और चीन का समर्थन मिला।

शीत युद्ध की विशेषताएँ

-प्रत्यक्ष युद्ध नहीं हुआ।

-हथियारों की दौड़ तेज हुई।

-प्रचार युद्ध (Propaganda War) चला।

-जासूसी गतिविधियाँ बढ़ीं।

-छोटे देशों में प्रॉक्सी युद्ध हुए।

 

गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM)

गुट का मतलब पक्ष , निरपेक्ष का मतलब -किसी के पक्ष या विपक्ष में नहीं -मतलब सबके साथ और किसी के साथ

नहीं -तठस्त 

आवश्यकता क्यों पड़ी ?

भारत सहित कई नए स्वतंत्र देशों ने निर्णय लिया कि वे किसी भी महाशक्ति के गुट में शामिल नहीं होंगे।

प्रमुख संस्थापक

-जवाहरलाल नेहरू (भारत)

-जोसिप ब्रोज़ टीटो (यूगोस्लाविया)

-गमाल अब्देल नासिर (मिस्र)

-सुकर्णो (इंडोनेशिया)

-क्वामे एनक्रूमा (घाना)

ये वह देश थे जो किसी दुसरे देश या देशों के झगड़े में न पड़ कर अपने देश के लोगों के भले के लिए काम करना चाहते थे, इसलिए दुनिया के उन सभी देशों से दूरी बना रहे थे जो युद्धों में विश्वास रखते थे और साथ ही बर्बाद भी हो रहे थे।  

पहला सम्मेलन

  • 1961
  • बेलग्रेड (यूगोस्लाविया)

 

भारत की भूमिका

भारत ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में गुटनिरपेक्ष आंदोलन को मजबूत किया। क्योंकि भारत को अंग्रेजों से आजाद हुवे ज्यादा समय नहीं हुवा था और भारत लगभग 300 साल तक ब्रिटिश उपनिवेश रहने के कारण गरीबी और भुखमरी से उबर रहा था, इसलिए भारत के राजनेता नहीं चाहते थे की वे विश्व के किसी भी युद्ध में सीधे या पीछे से शामिल हों।  साथ ही भारत अपने देश की तरक्की पर अधिक ध्यान देना चाहता था, इसलिए उसने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की साझेदारी में हिस्सा लिया।  

भारत के उद्देश्य

  • विश्व शांति
  • उपनिवेशवाद का विरोध
  • विकासशील देशों का सहयोग
  • स्वतंत्र विदेश नीति

 

शीत युद्ध के परिणाम

  • हथियारों की दौड़
  • परमाणु हथियारों का विस्तार
  • कई प्रॉक्सी युद्ध

प्रॉक्सी युद्ध वह युद्ध है जिसमें महाशक्तियाँ (जैसे अमेरिका या रूस ) स्वयं सीधे युद्ध न लड़कर किसी अन्य देश या समूह के माध्यम से युद्ध लड़ती हैं। या “दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर लड़ाई लड़ना”

उदाहरण : वियतनाम का युद्ध – वियतनाम का गृह युद्ध -उत्तरी वियतनाम के लोग दक्षिण वियतनाम के

लोगों से अमेरिका और सोवियत संघ के दिए हथियारों की मदद से एक दुसरे से खुनी संघर्ष कर रहे थे। 

{पकिस्तान भी 1971 के बाद से भारत से प्रॉक्सी युद्ध कर रहा है, पकिस्तान में तैयार किये आतंकियों और भारत के

कुछ भ्रमित या लालच दे कर लोगों से, आतंकी घटनाओं को अंजाम दे कर } 

  • संयुक्त राष्ट्र की भूमिका बढ़ी
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन का विकास

 

सोवियत संघ का विघटन (1991)

1991 में सोवियत संघ टूट गया। इसके साथ ही शीत युद्ध समाप्त हुआ और अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के रूप

में उभरा।

Q: शॉक थेरेपी क्या थी ?

An:

शीत युद्ध के बाद सोवियत संघ में “शॉक थेरेपी (Shock Therapy)” का मतलब था अर्थव्यवस्था को

बहुत कम समय में पूरी तरह बदल देना।

(शॉक थेरेपी- झटके से बीमार व्यवस्था का इलाज़- अचानक व्यवस्था में बदलाव)

इसे आसान भाषा में ऐसे समझिए:

मान लीजिए एक सरकारी स्कूल को अचानक अगले ही दिन से पूरी तरह प्राइवेट स्कूल बना दिया जाए। फीस, नियम, शिक्षक और व्यवस्था—सब कुछ एक साथ बदल जाए। इससे शुरुआत में बहुत अव्यवस्था और कठिनाई पैदा होगी। यही स्थिति सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था में हुई।

शॉक थेरेपी :

1991 में सोवियत संघ टूटने के बाद रूस और कुछ अन्य नए देशों ने अपनी समाजवादी (Socialist) अर्थव्यवस्था को पूंजीवादी (Capitalist) अर्थव्यवस्था में बदलने का फैसला किया।

इसके लिए सरकार ने एक साथ कई बड़े कदम उठाए:

  • सरकारी नियंत्रण हटाकर बाजार को खुला छोड़ दिया।
  • अधिकांश सरकारी उद्योगों का निजीकरण (Privatization) कर दिया।
  • वस्तुओं की कीमतों पर सरकारी नियंत्रण खत्म कर दिया।
  • विदेशी कंपनियों और निवेश को आने की अनुमति दी।
  • सरकारी सब्सिडी और आर्थिक सहायता कम कर दी।

इसे “शॉक” क्यों कहा गया?

क्योंकि ये सारे बदलाव धीरे-धीरे नहीं, बल्कि एक साथ-एक झटके में और बहुत तेजी से किए गए। लोगों और

उद्योगों को नए माहौल के अनुसार ढलने का समय नहीं मिला।

इसके परिणाम

नकारात्मक प्रभाव: बुरे प्रभाव या नुक्सान क्या हुवा ?

  • महंगाई बहुत तेजी से बढ़ गई।
  • लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं।
  • कई सरकारी कारखाने बंद हो गए।
  • गरीबी और आर्थिक असमानता बढ़ी।
  • कुछ लोगों ने बहुत कम कीमत पर सरकारी संपत्ति खरीदकर अपार धन कमा लिया।

सकारात्मक प्रभाव: अच्छे प्रभाव या फायदा क्या हुवा ?

  • निजी व्यापार और उद्यम बढ़े।
  • विदेशी निवेश आने लगा।
  • धीरे-धीरे बाजार आधारित अर्थव्यवस्था विकसित हुई।

परीक्षा के लिए एक लाइन

शॉक थेरेपी वह आर्थिक नीति थी जिसके तहत सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस और अन्य देशों ने सरकारी नियंत्रण वाली समाजवादी अर्थव्यवस्था को बहुत कम समय में बाजार आधारित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में बदलने का प्रयास किया।

याद रखने की ट्रिक

Shock Therapy = “एक झटके में आर्थिक बदलाव”

यानी धीरे-धीरे सुधार नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था को एक साथ बदल देना ही शॉक थेरेपी कहलाता है।

महत्वपूर्ण तिथियाँ

वर्ष घटना
1945 द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त
1947 शीत युद्ध की शुरुआत (सामान्यतः माना जाता है)
1949 NATO की स्थापना
1955 Warsaw Pact
1961 NAM की स्थापना
1962 क्यूबा मिसाइल संकट
1991 सोवियत संघ का विघटन

 

परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण अंतर

NATO बनाम Warsaw Pact

NATO Warsaw Pact
स्थापना: 1949 स्थापना: 1955
नेतृत्व: अमेरिका नेतृत्व: सोवियत संघ
उद्देश्य: पश्चिमी देशों की सुरक्षा उद्देश्य: पूर्वी देशों की सुरक्षा

 

1 अंक के प्रश्न

  1. शीत युद्ध क्या था?
  2. NATO की स्थापना कब हुई?
  3. Warsaw Pact किस वर्ष बना?
  4. NAM का पहला सम्मेलन कहाँ हुआ?
  5. क्यूबा मिसाइल संकट कब हुआ?

 

2 अंक के प्रश्न

  1. द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था क्या थी?
  2. गुटनिरपेक्ष आंदोलन की आवश्यकता क्यों पड़ी?

 

3 अंक के प्रश्न

  1. शीत युद्ध के तीन कारण लिखिए।
  2. शीत युद्ध के तीन प्रभाव लिखिए।

 

5 अंक के प्रश्न

  1. शीत युद्ध के कारणों और परिणामों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
  2. गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्यों एवं भारत की भूमिका का वर्णन कीजिए।

 

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तथ्य

  • Cold War = बिना प्रत्यक्ष युद्ध का संघर्ष ( Fight without Guns- बिना बन्दूक के दुश्मन देशों को कमजोर करने का संघर्ष )
  • NATO = 1949
  • Warsaw Pact = 1955
  • NAM = 1961
  • Belgrade = पहला NAM सम्मेलन
  • Cuban Missile Crisis = 1962
  • USSR Dissolution = 1991

 

 अगला अध्याय

अध्याय 2 : समकालीन विश्व में शक्ति के केंद्र (Contemporary Centres of Power)

इसमें हम विस्तार से पढ़ेंगे:

  • यूरोपीय संघ (EU)
  • ASEAN
  • चीन का उदय
  • जापान
  • रूस
  • भारत की वैश्विक भूमिका

 

अध्याय 2 –

सत्ता के समकालीन केंद्र 

अध्याय 3 –

समकालीन दक्षिण एशिया 

अध्याय 4 –

अंतर्राष्ट्रीय संगठन 

अध्याय 5-

समकालीन विश्व में सुरक्षा  

अध्याय 6 –

पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन 

अध्याय 7  –

विश्व सामाजिक मंच 

समकालीन विश्व राजनीति — अध्याय 4

अंतर्राष्ट्रीय संगठन (International Organisations)

International Organizations

बोर्ड परीक्षा के लिए सरल हिंदी में सम्पूर्ण नोट्स + महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

यह अध्याय मुख्य रूप से संयुक्त राष्ट्र (UN), उसकी आवश्यकता, संरचना, सुरक्षा परिषद, सुधारों और

भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी को समझाता है।

1. अंतर्राष्ट्रीय संगठन क्या हैं?

जब कई देश किसी साझा उद्देश्य के लिए मिलकर कोई संस्था या संगठन बनाते हैं, तो उसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन कहते हैं।

इनका उद्देश्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाना और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का समाधान करना होता है।

उदाहरण

  • संयुक्त राष्ट्र (UN) -United Nation
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) – World Health Organization
  • विश्व बैंक (WB) -World Bank
  • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) -International Monetary Fund
  • विश्व व्यापार संगठन (WTO) -World Trade Organization

 

2. अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की आवश्यकता क्यों है?

दुनिया में सभी देशों की अपनी-अपनी सरकारें हैं, लेकिन कुछ समस्याएँ ऐसी हैं जिन्हें कोई एक देश अकेले हल नहीं कर सकता।

जैसे—

  • युद्ध और संघर्ष
  • आतंकवाद
  • गरीबी
  • महामारी
  • जलवायु परिवर्तन
  • शरणार्थी समस्या
  • परमाणु हथियार
  • आर्थिक संकट

इन समस्याओं से निपटने के लिए देशों के बीच सहयोग आवश्यक है।

इसलिए अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की आवश्यकता होती है।

3. क्या अंतर्राष्ट्रीय संगठन “विश्व सरकार” हैं?

नहीं। विश्व की बड़ी संस्थाएं हैं।  

संयुक्त राष्ट्र या अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठन विश्व सरकार नहीं हैं।

इनके पास दुनिया के सभी देशों पर उसी तरह शासन करने की शक्ति नहीं है जिस तरह किसी देश की सरकार

अपने नागरिकों पर शासन करती है।

इनका मुख्य उद्देश्य है—

देशों को एक मंच प्रदान करना ताकि वे बातचीत, सहयोग और समझौते के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय

समस्याओं का समाधान कर सकें।

इन संस्थाओं को  विकसित देशों से दान (पैसा) मिलता है, और इस दान या

पैसा से, ये संस्थाएं गरीब या जरूरतमंद देशों में जरूरत के अनुरूप खर्च कर सहायता करती हैं।  

4. संयुक्त राष्ट्र (United Nations)

संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई।

इसकी स्थापना का प्रमुख कारण था—

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व में शांति और सुरक्षा स्थापित करना।

संयुक्त राष्ट्र से पहले राष्ट्र संघ (League of Nations) था, लेकिन वह विश्व शांति बनाए रखने में सफल नहीं हुआ।

5. संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख उद्देश्य

संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख उद्देश्य हैं—

  1. अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना।
  2. देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध बढ़ाना।
  3. अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना।
  4. मानवाधिकारों की रक्षा करना।
  5. आर्थिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देना।
  6. अंतरराष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान करना।

 

6. संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख अंग

संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंग हैं—

1. महासभा (General Assembly)

सभी सदस्य देश इसमें शामिल होते हैं।

2. सुरक्षा परिषद (Security Council)

अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों पर निर्णय लेती है।

3. आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC)

आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर काम करती है।

4. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice)

देशों के बीच कानूनी विवादों का समाधान करता है।

5. सचिवालय (Secretariat)

संयुक्त राष्ट्र के प्रशासनिक कार्य करता है।

6. न्यास परिषद (Trusteeship Council)

इसका मूल उद्देश्य न्यास क्षेत्रों की देखरेख करना था। अब इसका काम लगभग समाप्त हो चुका है।

7. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद

यह अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण विषय है।

सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली अंग माना जाता है।

इसकी जिम्मेदारी है—

अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना।

8. सुरक्षा परिषद की संरचना

सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं।

स्थायी सदस्य — 5

इन्हें P5 कहा जाता है।

  1. अमेरिका
  2. रूस
  3. चीन
  4. ब्रिटेन
  5. फ्रांस

अस्थायी सदस्य — 10

इनका चुनाव महासभा द्वारा दो वर्ष के लिए किया जाता है।

9. वीटो शक्ति क्या है?

सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों के पास वीटो शक्ति है।

यदि पाँच स्थायी सदस्यों में से कोई एक किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव के खिलाफ वोट करता है, तो प्रस्ताव को रोका जा सकता है।

इसी शक्ति को वीटो शक्ति कहते हैं।

सरल उदाहरण

मान लीजिए सुरक्षा परिषद में किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर मतदान होता है।

अगर पर्याप्त समर्थन होने के बावजूद किसी स्थायी सदस्य ने वीटो कर दिया, तो प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता।

10. वीटो शक्ति पर विवाद

वीटो शक्ति को लेकर विवाद इसलिए है क्योंकि—

  • पाँच देशों के पास विशेष अधिकार है।
  • बाकी देशों के पास ऐसी शक्ति नहीं है।
  • वर्तमान विश्व राजनीति 1945 की तुलना में बहुत बदल चुकी है।
  • आज कई नए शक्तिशाली देश सामने आए हैं।

इसलिए सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग लगातार होती रही है।

11. संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता क्यों है?

संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान संरचना मुख्य रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों को दर्शाती है।

लेकिन आज—

  • एशिया की शक्ति बढ़ी है।
  • अफ्रीका के कई स्वतंत्र देश हैं।
  • लैटिन अमेरिका की भूमिका बढ़ी है।
  • भारत, जापान और जर्मनी जैसी शक्तियाँ महत्वपूर्ण हैं।
  • विश्व की अर्थव्यवस्था और राजनीति बदल गई है।

इसलिए संयुक्त राष्ट्र की संरचना में सुधार की आवश्यकता महसूस होती है।

12. सुरक्षा परिषद में सुधार

सुधार की मुख्य मांगें हैं—

1. स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए।

2. अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए।

3. एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को अधिक प्रतिनिधित्व मिले।

4. विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाई जाए।

 

13. भारत की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की दावेदारी

भारत सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का मजबूत दावेदार है।

भारत इसके लिए कई तर्क देता है।

भारत का पहला तर्क — बड़ी जनसंख्या

भारत दुनिया के सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में से एक है।

दूसरा — लोकतंत्र

भारत विश्व का एक बड़ा और महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक देश है।

तीसरा — अर्थव्यवस्था

भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।

चौथा — संयुक्त राष्ट्र में योगदान

भारत ने संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

पाँचवाँ — शांति स्थापना

भारत ने संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों (Peacekeeping Operations) में बड़ी संख्या में सैनिक भेजे हैं।

छठा — विकासशील देशों की आवाज

भारत विकासशील देशों और वैश्विक दक्षिण के हितों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है।

14. भारत की स्थायी सदस्यता के विरोध में तर्क

कुछ देश भारत की दावेदारी को लेकर अलग-अलग चिंताएँ रखते हैं।

मुख्य आपत्तियाँ—

  • सुरक्षा परिषद में नए स्थायी सदस्यों को शामिल करने पर शक्ति संतुलन बदल सकता है।
  • क्षेत्रीय राजनीति में कुछ देशों को भारत की सदस्यता पर आपत्ति हो सकती है।
  • कुछ देश अपने क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों को स्थायी सदस्य नहीं बनाना चाहते।

हालाँकि भारत की सदस्यता के समर्थन में भी कई देश हैं।

15. संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियाँ

संयुक्त राष्ट्र की कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं—

1. शांति स्थापना

युद्धग्रस्त क्षेत्रों में शांति स्थापना के प्रयास।

2. मानवाधिकार

मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों को बढ़ावा देना।

3. स्वास्थ्य

WHO जैसी संस्थाओं के माध्यम से वैश्विक स्वास्थ्य के क्षेत्र में सहयोग।

4. शरणार्थी सहायता

शरणार्थियों की सहायता और पुनर्वास।

5. विकास

गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के क्षेत्र में काम।

6. अंतरराष्ट्रीय सहयोग

देशों को बातचीत के लिए एक साझा मंच उपलब्ध कराना।

16. संयुक्त राष्ट्र की सीमाएँ

संयुक्त राष्ट्र की कुछ महत्वपूर्ण सीमाएँ भी हैं।

1. वीटो शक्ति

P5 के पास अत्यधिक विशेषाधिकार हैं।

2. शक्तिशाली देशों पर निर्भरता

संयुक्त राष्ट्र के पास अपनी स्वतंत्र सैन्य शक्ति सीमित है।

3. बड़े देशों के मतभेद

यदि शक्तिशाली देश किसी मुद्दे पर सहमत न हों तो निर्णय लेना कठिन हो जाता है।

4. सुरक्षा परिषद की पुरानी संरचना

आज की विश्व व्यवस्था का पूरा प्रतिनिधित्व वर्तमान संरचना नहीं करती।

17. संयुक्त राष्ट्र को मजबूत करने के उपाय

संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी बनाने के लिए—

  • सुरक्षा परिषद में सुधार होना चाहिए।
  • विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व बढ़ना चाहिए।
  • वीटो व्यवस्था में सुधार पर विचार होना चाहिए।
  • अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को अधिक लोकतांत्रिक बनाया जाना चाहिए।
  • देशों के बीच सहयोग बढ़ना चाहिए।

 

⭐ महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. अंतर्राष्ट्रीय संगठन क्या हैं?

उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय संगठन वे संस्थाएँ हैं जिनकी स्थापना कई देशों द्वारा साझा उद्देश्यों और समस्याओं के समाधान के लिए की जाती है। इनका उद्देश्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाना, शांति स्थापित करना और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का समाधान करना है।

प्रश्न 2. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब हुई?

उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई।

प्रश्न 3. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना क्यों की गई?

उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व में शांति और सुरक्षा स्थापित करने, देशों के बीच सहयोग बढ़ाने तथा भविष्य में बड़े युद्धों को रोकने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई।

प्रश्न 4. संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंग कौन-से हैं?

उत्तर:

  1. महासभा
  2. सुरक्षा परिषद
  3. आर्थिक एवं सामाजिक परिषद
  4. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय
  5. सचिवालय
  6. न्यास परिषद

 

प्रश्न 5. सुरक्षा परिषद में कितने सदस्य होते हैं?

उत्तर:
सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं—
5 स्थायी और 10 अस्थायी सदस्य।

प्रश्न 6. सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य कौन हैं?

उत्तर:

  1. अमेरिका
  2. रूस
  3. चीन
  4. ब्रिटेन
  5. फ्रांस

इन्हें P5 कहा जाता है।

प्रश्न 7. वीटो शक्ति क्या है?

उत्तर:
सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों को प्राप्त वह विशेष अधिकार जिसके द्वारा वे किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को रोक सकते हैं, वीटो शक्ति कहलाती है।

प्रश्न 8. सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता क्यों है?

उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान सुरक्षा परिषद की संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की शक्ति व्यवस्था को दर्शाती है। आज विश्व में राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का वितरण बदल चुका है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों को अधिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। इसलिए सुरक्षा परिषद में सुधार आवश्यक है।

प्रश्न 9. भारत सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता क्यों चाहता है?

उत्तर:

भारत की दावेदारी के प्रमुख आधार हैं—

  1. भारत की विशाल जनसंख्या।
  2. भारत का लोकतांत्रिक स्वरूप।
  3. भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति।
  4. संयुक्त राष्ट्र के कार्यों में भारत का योगदान।
  5. संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका।
  6. विकासशील देशों के हितों की आवाज उठाने में भारत की भूमिका।

 

प्रश्न 10. भारत ने संयुक्त राष्ट्र में क्या योगदान दिया है?

उत्तर:
भारत ने संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न कार्यक्रमों और शांति अभियानों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत ने कई देशों में संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में सैनिक भेजे हैं। भारत ने विकासशील देशों की समस्याओं और उनके हितों को भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया है।

प्रश्न 11. क्या संयुक्त राष्ट्र विश्व सरकार है?

उत्तर:
नहीं। संयुक्त राष्ट्र विश्व सरकार नहीं है। इसके पास दुनिया के सभी देशों पर सीधे शासन करने की शक्ति नहीं है। यह देशों के बीच बातचीत, सहयोग और सामूहिक निर्णय के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मंच है।

प्रश्न 12. संयुक्त राष्ट्र की दो प्रमुख उपलब्धियाँ लिखिए।

उत्तर:

  1. अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए शांति अभियानों का संचालन।
  2. मानवाधिकार, स्वास्थ्य, विकास और शरणार्थी सहायता जैसे क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग।

 

प्रश्न 13. संयुक्त राष्ट्र की दो सीमाएँ बताइए।

उत्तर:

  1. सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों को वीटो शक्ति प्राप्त है।
  2. शक्तिशाली देशों के बीच मतभेद होने पर संयुक्त राष्ट्र कई मामलों में प्रभावी निर्णय नहीं ले पाता।

 

⭐ 4 अंकों का महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न: संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता के चार कारण लिखिए।

उत्तर:

  1. वर्तमान सुरक्षा परिषद की संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के समय की शक्ति व्यवस्था को दर्शाती है।
  2. एशिया और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
  3. भारत, जापान और जर्मनी जैसे महत्वपूर्ण देशों को स्थायी सदस्यता प्राप्त नहीं है।
  4. विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने की आवश्यकता है।

 

⭐ 6 अंकों का महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न: भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता क्यों मिलनी चाहिए? तर्क दीजिए।

उत्तर:

भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता देने के पक्ष में कई मजबूत तर्क हैं।

पहला, भारत विश्व की बड़ी जनसंख्या वाला देश है।

दूसरा, भारत विश्व का एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक देश है।

तीसरा, भारत की अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव लगातार बढ़ा है।

चौथा, भारत ने संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

पाँचवाँ, भारत विकासशील देशों की समस्याओं और हितों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है।

छठा, वर्तमान सुरक्षा परिषद में विकासशील देशों और विशेष रूप से एशिया का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।

निष्कर्ष:
भारत की बढ़ती आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक भूमिका को देखते हुए सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता से संयुक्त राष्ट्र अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और लोकतांत्रिक बन सकता है।

⭐ 6 अंकों का दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न: संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियों और सीमाओं की चर्चा कीजिए।

उपलब्धियाँ

  • अंतरराष्ट्रीय शांति के प्रयास।
  • शांति अभियानों का संचालन।
  • मानवाधिकारों को बढ़ावा।
  • स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग।
  • शरणार्थियों की सहायता।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग का मंच।

सीमाएँ

  • वीटो शक्ति के कारण निर्णयों में बाधा।
  • शक्तिशाली देशों के मतभेद।
  • सुरक्षा परिषद की पुरानी संरचना।
  • संयुक्त राष्ट्र की अपनी स्वतंत्र शक्ति सीमित होना।

निष्कर्ष

संयुक्त राष्ट्र की कमियाँ होने के बावजूद यह विश्व राजनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण संस्था है। इसे समाप्त करने के

बजाय सुधार कर अधिक लोकतांत्रिक और प्रभावी बनाना अधिक उचित है।

📌 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण अंतर

महासभा और सुरक्षा परिषद

महासभा सुरक्षा परिषद
सभी सदस्य देश शामिल 15 सदस्य
प्रत्येक सदस्य देश का प्रतिनिधित्व 5 स्थायी + 10 अस्थायी
सामान्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा शांति और सुरक्षा पर विशेष अधिकार
सभी देशों को समान मतदान अधिकार स्थायी सदस्यों के पास वीटो
व्यापक प्रतिनिधित्व अधिक शक्तिशाली निर्णयकारी भूमिका

 

 एक नजर में पूरा अध्याय:

अंतर्राष्ट्रीय संगठन

देशों के बीच सहयोग

संयुक्त राष्ट्र — 1945

विश्व शांति और सुरक्षा

सुरक्षा परिषद — 15 सदस्य

P5 — अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस

वीटो शक्ति

सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग

विकासशील देशों का अधिक प्रतिनिधित्व

भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी

🔥 बोर्ड परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न

इन प्रश्नों को विशेष रूप से तैयार करें:

  1. अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की आवश्यकता क्यों है?
  2. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब और क्यों हुई?
  3. संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख अंगों का वर्णन कीजिए।
  4. सुरक्षा परिषद की संरचना समझाइए।
  5. वीटो शक्ति क्या है?
  6. संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता क्यों है?
  7. भारत सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का दावेदार क्यों है?
  8. संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियाँ और सीमाएँ लिखिए।
  9. क्या संयुक्त राष्ट्र को विश्व सरकार कहा जा सकता है?
  10. सुरक्षा परिषद में विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व क्यों बढ़ाया जाना चाहिए?
  11. भारत ने संयुक्त राष्ट्र में क्या योगदान दिया है?
  12. संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी बनाने के लिए क्या सुधार आवश्यक हैं?

— अध्याय 6 

कक्षा 12 राजनीति विज्ञान- समकालीन विश्व राजनीति

पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

बोर्ड परीक्षा के लिए सम्पूर्ण सरल हिंदी नोट्स + महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

नोट:

इस अध्याय में पर्यावरण के साथ  NCERT में इसका मुख्य संबंविश्व राजनीति, प्राकृतिक संसाधनों के

बँटवारे, विकसित-विकासशील देशों के मतभेद और पर्यावरणीय न्याय से है।

1. पर्यावरण क्या है?

हमारे चारों ओर मौजूद प्राकृतिक और भौतिक परिस्थितियों को पर्यावरण कहते हैं।

इसमें शामिल हैं—

  1. वायु
  2. जल
  3. भूमि
  4. जंगल
  5. नदियाँ
  6. समुद्र
  7. पहाड़
  8. वन्य जीव
  9. खनिज
  10. पेड़-पौधे
  11. प्राकृतिक संसाधन

मनुष्य अपने जीवन और विकास के लिए पर्यावरण पर निर्भर है।

What is Invironment ?

2. प्राकृतिक संसाधन क्या हैं?

प्रकृति से प्राप्त वे वस्तुएँ जिनका उपयोग मनुष्य अपनी आवश्यकताओं के लिए करता है,तथा जिन वस्तुओं का उपयोग धन सम्पदा के रूप में किया जा सकता है, प्राकृतिक संसाधन कहलाती हैं।

उदाहरण:-

  • जल -(पीने का पानी, सिंचाई, नहाने और धोने में प्रयोग, बिजलीघर, मछली,मुर्गी, पशु पालन, कारखानों, कपडा उद्योग में पानी की आवश्यकता ) 
  • जंगल -(लकड़ी, फर्नीचर, जंगली जानवर, हरियाली, धरती के फेफड़े (ऑक्सीजन का सोर्स ), वातावरण, मौसम का प्रभाव )
  • भूमि- (शहर, गांव, कसबे, खेत, खेल के मैदान, सड़कें )
  • कोयला- (कारखानों को चलाने का ईंधन, खाना पकाने का ईंधन, बिजली बनाने का ईंधन)
  • पेट्रोलियम- (पेट्रोल, डीज़ल, मिटटी का तेल, कोलतार (सड़कें बनाने का सामान), पेट्रोकेमिकल, मोम, प्लास्टिक दाना, प्लास्टिक कच्चा माल, धागे आदि )
  • प्राकृतिक गैस- (CNG, PNG, LPG गैस -ईंधन )
  • लौह अयस्क- (लोहा स्टील बनाने का कच्चा माल )
  • अन्य खनिज- (नमक,तांबा, पीतल, एलुमिनियम, ज़िंक, कोबाल्ट, सोना, चांदी, अन्य खनिज )
  • मछली- (समुद्री तथा नदियों से मिलने वाले खाद्य उत्पाद- मछली, झींगा, केकड़ा )
  • वन्य जीव (शेर चीते बाघ , हिरन-सांभर-जंगली भैंस, भेड़िया, पक्षी आदि )

 

3. पर्यावरण की समस्या विश्व राजनीति का विषय क्यों बनी?

पहले पर्यावरण को मुख्य रूप से स्थानीय समस्या माना जाता था।

लेकिन औद्योगीकरण, तेजी से बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपयोग के कारण पर्यावरणीय समस्याएँ वैश्विक हो गईं।

उदाहरण—

  • जलवायु परिवर्तन
  • ग्लोबल वार्मिंग
  • वायु प्रदूषण
  • जल प्रदूषण
  • जंगलों की कटाई
  • जैव विविधता का नुकसान
  • समुद्र का प्रदूषण
  • प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन

इन समस्याओं का प्रभाव किसी एक देश तक सीमित नहीं रहता।

इसलिए पर्यावरण अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है।

4. पर्यावरण से जुड़े प्रमुख वैश्विक मुद्दे

1. ग्लोबल वार्मिंग

पृथ्वी के औसत तापमान में लगातार वृद्धि को सामान्य रूप से वैश्विक तापन या ग्लोबल वार्मिंग कहा जाता है।

इसका संबंध मुख्य रूप से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा से है।

2. जलवायु परिवर्तन

लंबे समय में पृथ्वी की जलवायु में होने वाले महत्वपूर्ण बदलाव को जलवायु परिवर्तन कहते हैं।

इसके प्रभावों में शामिल हैं—

  • तापमान में वृद्धि या अचानक बदलाव 
  • वर्षा के पैटर्न में बदलाव (वर्षा का कम या अधिक होना )
  • सूखा (कई वर्षों तक वर्षा में कमी या बिलकुल न होना )
  • बाढ़ (अचानक जरूरत से ज्यादा बारिश और उससे बढ़ा जल प्रलय )
  • समुद्र के स्तर में वृद्धि (ठन्डे स्थानों पर बर्फ का ज्यादा पिखलना और समुद्र में पानी की मात्रा बढ़ जाना )
  • कृषि पर प्रभाव (समय पर बारिश का आभाव या अत्यधिक वर्षा से जल भराव )
  • जैव विविधता को नुकसान (प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ना और जीवों पर इसका बुरा प्रभाव )

 

5. वैश्विक संपदा / साझी संपदा

(दुनिया में सबकी साझी हिस्सेदारी -सबकी जिम्मेदारी  )

ऐसे संसाधन या क्षेत्र जिन पर किसी एक देश का पूर्ण अधिकार नहीं माना जाता और जिनका संबंध पूरी मानवता से

है, उन्हें वैश्विक साझी संपदा (Global Commons) कहा जाता है।

उदाहरण:-

  • वायुमंडल
  • अंटार्कटिका
  • समुद्र का अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र
  • बाहरी अंतरिक्ष

इन संसाधनों की सुरक्षा के लिए देशों को मिलकर काम करना पड़ता है।

परीक्षा में लिखें:

Global Commons ऐसे क्षेत्र या संसाधन हैं जो किसी एक देश के अधिकार क्षेत्र में पूरी तरह नहीं आते

और जिनके संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है।

6. प्राकृतिक संसाधनों को लेकर संघर्ष-

प्राकृतिक संसाधनों का वितरण पूरी दुनिया में समान नहीं है।

कुछ देशों के पास—

  • तेल
  • गैस
  • कोयला
  • खनिज
  • जंगल
  • पानी

जैसे संसाधन अधिक हैं, जबकि कुछ देशों के पास इनकी कमी है।

इसी कारण प्राकृतिक संसाधनों को लेकर देशों, कंपनियों और स्थानीय समुदायों के बीच संघर्ष पैदा हो सकते हैं।

7. संसाधनों का असमान वितरण

प्राकृतिक संसाधनों का वितरण समान नहीं है।

उदाहरण के लिए कुछ देशों के पास बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम है, जबकि कुछ देश पेट्रोलियम के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हैं।

इससे—

प्राकृतिक संसाधन → आर्थिक शक्ति → राजनीतिक प्रभाव

का संबंध बन सकता है।

8. पर्यावरणीय न्याय क्या है?

पर्यावरणीय न्याय का अर्थ है कि पर्यावरण की सुरक्षा और पर्यावरण से होने वाले नुकसान का बोझ सभी लोगों और देशों पर न्यायपूर्ण तरीके से पड़े।

यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—

जिन देशों ने ऐतिहासिक रूप से अधिक प्रदूषण किया है, क्या पर्यावरण की जिम्मेदारी भी उन्हें अधिक नहीं उठानी चाहिए?

विकासशील देश अक्सर इसी आधार पर विकसित देशों से अधिक जिम्मेदारी निभाने की मांग करते हैं।

9. विकसित और विकासशील देशों का विवाद

पर्यावरण के मुद्दे पर विकसित और विकासशील देशों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं।

विकसित देशों का तर्क

विकसित देश अक्सर पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण कम करने के लिए सभी देशों से सहयोग की मांग करते हैं।

विकासशील देशों का तर्क

विकासशील देशों का कहना है कि—

  • विकसित देशों ने औद्योगीकरण के दौरान लंबे समय तक प्राकृतिक संसाधनों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया।
  • ऐतिहासिक रूप से उन्होंने अधिक मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया।
  • विकासशील देशों को अभी गरीबी हटाने और आर्थिक विकास की जरूरत है।
  • इसलिए पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी समान नहीं बल्कि न्यायपूर्ण और अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार होनी चाहिए।

 

10. “साझी लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियाँ”

यह अध्याय का बहुत महत्वपूर्ण विचार है।

इसे अंग्रेजी में कहा जाता है:

Common but Differentiated Responsibilities — CBDR

इसका अर्थ है—

पर्यावरण की रक्षा करना सभी देशों की जिम्मेदारी है, लेकिन सभी देशों की जिम्मेदारी समान मात्रा में नहीं हो सकती।

क्यों?

क्योंकि—

  • सभी देशों का ऐतिहासिक योगदान समान नहीं है।
  • सभी देशों की आर्थिक क्षमता समान नहीं है।
  • विकसित देशों ने औद्योगीकरण पहले शुरू किया।
  • विकासशील देशों को अभी विकास की जरूरत है।

परीक्षा में जरूर लिखें:

साझी लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियाँ का सिद्धांत कहता है कि पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी सभी

देशों की है, लेकिन उनकी ऐतिहासिक जिम्मेदारी, आर्थिक क्षमता और विकास की परिस्थितियों को ध्यान

में रखते हुए जिम्मेदारी अलग-अलग होनी चाहिए।

11. रियो पृथ्वी सम्मेलन, 1992

पर्यावरण के क्षेत्र में 1992 का रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मेलन बहुत महत्वपूर्ण था।

इसे Earth Summit भी कहा जाता है।

इस सम्मेलन में पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन पर चर्चा हुई।

प्रमुख मुद्दे

  • पर्यावरण संरक्षण
  • सतत विकास
  • जैव विविधता
  • जलवायु परिवर्तन
  • विकासशील देशों की जरूरतें
  • वैश्विक सहयोग

 

12. एजेंडा 21

रियो सम्मेलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण दस्तावेज Agenda 21 था।

इसमें 21वीं सदी में सतत विकास के लिए विभिन्न कार्यों की दिशा बताई गई।

इसका उद्देश्य था—

विकास + पर्यावरण संरक्षण = संरक्षण के साथ विकास

13. सतत विकास (Sustainable Development)

सतत  (लगातार-वास्तविक-सही ) विकास का अर्थ है ऐसा विकास जिसमें वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताएँ पूरी हों, लेकिन भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता नष्ट न हो।

सरल भाषा में:

आज विकास करें लेकिन भविष्य के लिए प्रकृति को पूरी तरह खत्म न करें।

( केवल आज का विकास – भविष्य का विनाश नहीं )

उदाहरण:

अगर हम जंगल काटकर आज लाभ कमा लें, लेकिन आने वाली पीढ़ियों के लिए जंगल ही नहीं बचेंगे, तो यह सतत

विकास नहीं है।

14. पर्यावरण संरक्षण और विकास का संबंध-

विकासशील देशों के सामने एक कठिन समस्या है।

उन्हें चाहिए—

  • रोजगार
  • उद्योग
  • बिजली
  • सड़क
  • आवास
  • शिक्षा
  • स्वास्थ्य
  • आर्थिक विकास

लेकिन विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग होता है।

इसलिए चुनौती है

विकास भी हो और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे।

यही सतत विकास की मूल भावना है।

15. भारत का दृष्टिकोण-

भारत पर्यावरण संरक्षण का समर्थन करता है, लेकिन साथ ही विकासशील देश के रूप में अपनी विकास संबंधी आवश्यकताओं पर भी जोर देता है।

भारत का तर्क रहा है कि—

  • पर्यावरण संरक्षण आवश्यक है।
  • लेकिन विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
  • विकासशील देशों को गरीबी हटाने और आर्थिक विकास का अवसर मिलना चाहिए।
  • पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी न्यायपूर्ण होनी चाहिए।

 

16. भारत और वैश्विक पर्यावरण राजनीति-

भारत ने कई अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय प्रयासों में भाग लिया है।

भारत का दृष्टिकोण मोटे तौर पर यह रहा है कि:

पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन होना चाहिए।

भारत विकसित देशों से यह भी अपेक्षा करता है कि वे—

  • विकसित देशों की अधिक जिम्मेदारी, क्योंकि विकसित देशों ने अपने देश को विकसित करने में पहले ही बहुत अधिक प्रकृति का नुक्सान कर दिया है, इसलिए ये विकसित देश अब विकसित हो रहे देशों को विकास करने में रोड़ा न बन कर, उनकी समझदारी से विकास करने में मदद करें और अधिक जिम्मेदारी लें।  
  • तकनीक उपलब्ध कराएँ,
  • वित्तीय सहायता दें,
  • विकासशील देशों (अब विकास कर रहे देश) के विकास के अधिकार का सम्मान करें।

 

17. पर्यावरण आंदोलनों की भूमिका-

भारत में कई पर्यावरण आंदोलनों ने पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

चिपको आंदोलन:

चिपको आंदोलन में स्थानीय लोगों ने पेड़ों की कटाई का विरोध किया।

लोग पेड़ों से चिपक जाते थे ताकि उन्हें काटने से रोका जा सके।

इस आंदोलन का संबंध—

  • जंगल बचाने
  • स्थानीय लोगों के अधिकार
  • पर्यावरण संरक्षण

से था।

18. प्राकृतिक संसाधन और स्थानीय समुदाय:

कई आदिवासी और स्थानीय समुदायों का जीवन जंगल, जमीन और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है।

जब बड़े बाँध, खनन परियोजनाएँ या औद्योगिक परियोजनाएँ शुरू होती हैं, तो कई बार—

  • लोगों का विस्थापन होता है।
  • आजीविका प्रभावित होती है।
  • जंगल और जमीन का नुकसान होता है।

इसलिए पर्यावरण का सवाल केवल पेड़-पौधों का सवाल नहीं है, बल्कि लोगों के अधिकार और आजीविका का

भी सवाल है।

19. पर्यावरण और सुरक्षा:

पर्यावरण की समस्या को सुरक्षा से भी जोड़ा जाता है।

उदाहरण:

जल की कमी → कृषि पर प्रभाव → रोजगार की समस्या → लोगों का विस्थापन → सामाजिक तनाव

इस प्रकार प्राकृतिक संसाधनों की कमी भविष्य में राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष पैदा कर सकती है।

20. पर्यावरणीय समस्याओं का राजनीतिक स्वरूप:

पर्यावरणीय समस्या केवल वैज्ञानिक समस्या नहीं है।

यह राजनीतिक भी है क्योंकि इसमें सवाल उठते हैं—

  • संसाधनों का उपयोग कौन करेगा?
  • किसे कितना लाभ मिलेगा?
  • प्रदूषण की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
  • पर्यावरण संरक्षण का खर्च कौन देगा?
  • विकास की कीमत कौन चुकाएगा?
  • स्थानीय लोगों के अधिकार क्या होंगे?

इसलिए पर्यावरण विश्व राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा है।

⭐ महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1. प्राकृतिक संसाधन क्या हैं?

उत्तर:

प्रकृति से प्राप्त वे वस्तुएँ जिनका उपयोग मनुष्य अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करता है, प्राकृतिक

संसाधन कहलाती हैं। जैसे जल, जंगल, भूमि, खनिज, कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस।

प्रश्न 2. वैश्विक साझी संपदा क्या है?

उत्तर:
ऐसे संसाधन या क्षेत्र जो किसी एक देश के अधिकार क्षेत्र में पूरी तरह नहीं आते और जिनका संबंध पूरी मानवता से

है, वैश्विक साझी संपदा कहलाते हैं। जैसे वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्र के अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र और बाहरी अंतरिक्ष।

प्रश्न 3. पर्यावरण विश्व राजनीति का विषय क्यों बन गया है?

उत्तर:
पर्यावरणीय समस्याएँ अब किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, जंगलों की कटाई और जैव विविधता का नुकसान पूरी दुनिया को प्रभावित करता है। इसलिए इन समस्याओं को हल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है और पर्यावरण विश्व राजनीति का विषय बन गया है।

प्रश्न 4. वैश्विक साझी संपदा के दो उदाहरण दीजिए।

उत्तर:

  1. अंटार्कटिका
  2. बाहरी अंतरिक्ष

इसके अतिरिक्त वायुमंडल और समुद्र के अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र भी इसके उदाहरण हैं।

प्रश्न 5. पर्यावरणीय न्याय से क्या समझते हैं?

उत्तर:
पर्यावरणीय न्याय का अर्थ है कि पर्यावरणीय संसाधनों का उपयोग और पर्यावरणीय नुकसान का बोझ न्यायपूर्ण

तरीके से बाँटा जाए। जिन देशों और समूहों ने ऐतिहासिक रूप से अधिक प्रदूषण किया है, उनसे अधिक

जिम्मेदारी लेने की अपेक्षा की जाती है।

प्रश्न 6. विकसित और विकासशील देशों के बीच पर्यावरण को लेकर विवाद क्यों है?

उत्तर:


विकसित देशों ने औद्योगीकरण के दौरान लंबे समय तक प्राकृतिक संसाधनों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया

और बड़ी मात्रा में प्रदूषण किया। विकासशील देशों का तर्क है कि उन्हें भी गरीबी हटाने और आर्थिक विकास का

अधिकार है। इसलिए वे पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी में ऐतिहासिक योगदान और आर्थिक क्षमता को ध्यान में

रखने की मांग करते हैं।

प्रश्न 7. “साझी लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियाँ” से क्या समझते हैं?

उत्तर:
इसका अर्थ है कि पर्यावरण की रक्षा करना सभी देशों की जिम्मेदारी है, लेकिन सभी देशों की जिम्मेदारी समान

नहीं हो सकती। विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी और आर्थिक क्षमता अधिक होने के कारण उनसे

पर्यावरण संरक्षण में अधिक योगदान की अपेक्षा की जाती है।

प्रश्न 8. रियो पृथ्वी सम्मेलन कब हुआ?

उत्तर:


रियो पृथ्वी सम्मेलन 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरो में हुआ था। इसे Earth Summit भी कहा जाता है।

प्रश्न 9. सतत विकास क्या है?

उत्तर:
ऐसा विकास जिसमें वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताएँ पूरी हों और भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा

करने की क्षमता भी बनी रहे, सतत विकास कहलाता है।

प्रश्न 10. चिपको आंदोलन क्यों महत्वपूर्ण था?

उत्तर:
चिपको आंदोलन जंगलों की कटाई के विरोध में चलाया गया था। इसमें स्थानीय लोगों ने पेड़ों से चिपककर उन्हें काटे जाने से बचाने का प्रयास किया। इस आंदोलन ने पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों को प्रमुखता दी।

3–4 अंकों के महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न: पर्यावरण संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग क्यों आवश्यक है?

उत्तर:
पर्यावरणीय समस्याएँ किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं रहतीं। वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल

वार्मिंग और समुद्री प्रदूषण का प्रभाव अनेक देशों पर पड़ता है। इसलिए कोई एक देश अकेले इन समस्याओं को

पूरी तरह हल नहीं कर सकता। अंतरराष्ट्रीय समझौते, तकनीकी सहयोग, वित्तीय सहायता और साझा प्रयास

आवश्यक हैं।

प्रश्न: प्राकृतिक संसाधनों को लेकर संघर्ष क्यों होते हैं?

उत्तर:

  1. प्राकृतिक संसाधनों का वितरण असमान है।
  2. संसाधन आर्थिक शक्ति का स्रोत हैं।
  3. विभिन्न देशों और समुदायों की संसाधनों पर अलग-अलग आवश्यकताएँ हैं।
  4. बड़ी परियोजनाओं से स्थानीय लोगों का विस्थापन हो सकता है।
  5. संसाधनों के अत्यधिक उपयोग से भविष्य में उनकी कमी हो सकती है।

 

प्रश्न: पर्यावरण और विकास के बीच क्या संबंध है?

उत्तर:
आर्थिक विकास के लिए ऊर्जा, भूमि, जल और खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। लेकिन इनका अत्यधिक उपयोग पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकता है। इसलिए विकास ऐसा होना चाहिए जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरण की रक्षा भी हो। इसी विचार को सतत विकास कहा जाता है।

⭐ 6 अंकों का संभावित प्रश्न

प्रश्न: पर्यावरण के मुद्दे पर विकसित और विकासशील देशों के दृष्टिकोण की तुलना कीजिए।

उत्तर:

विकसित देशों का दृष्टिकोण:

  • पर्यावरण संरक्षण पर जोर।
  • प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों को कम करने की मांग।
  • सभी देशों से पर्यावरणीय सहयोग की अपेक्षा।

विकासशील देशों का दृष्टिकोण:

  • गरीबी हटाना और आर्थिक विकास आवश्यक।
  • विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी अधिक है।
  • सभी देशों की जिम्मेदारी समान नहीं हो सकती।
  • विकासशील देशों को तकनीक और वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए।
  • पर्यावरण संरक्षण के साथ विकास के अधिकार को भी स्वीकार किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष:

विकासशील देशों का मुख्य तर्क है कि पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी न्यायपूर्ण तरीके से बाँटी जानी चाहिए। इसी संदर्भ में “साझी लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियाँ” का सिद्धांत महत्वपूर्ण है।

 बोर्ड परीक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण शब्द

शब्द सरल अर्थ
पर्यावरण हमारे चारों ओर की प्राकृतिक परिस्थितियाँ
प्राकृतिक संसाधन प्रकृति से मिलने वाली उपयोगी वस्तुएँ
ग्लोबल वार्मिंग पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि
जलवायु परिवर्तन लंबे समय में जलवायु में बदलाव
Global Commons पूरी मानवता से जुड़े साझे संसाधन/क्षेत्र
सतत विकास वर्तमान और भविष्य दोनों की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकास
पर्यावरणीय न्याय पर्यावरणीय लाभ और नुकसान का न्यायपूर्ण बँटवारा
CBDR साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियाँ
MNC बहुराष्ट्रीय कंपनी
Earth Summit 1992 का रियो पृथ्वी सम्मेलन

 

🔥 Last-Minute Revision

परीक्षा से पहले इन 10 बिंदुओं को जरूर याद करें:

  1. पर्यावरण = प्रकृति और मनुष्य के आसपास की प्राकृतिक परिस्थितियाँ।
  2. प्राकृतिक संसाधन = प्रकृति से मिलने वाले उपयोगी संसाधन।
  3. पर्यावरण अब वैश्विक राजनीति का मुद्दा है।
  4. Global Commons — वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्र का अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र आदि।
  5. 1992 — रियो पृथ्वी सम्मेलन।
  6. Agenda 21 — सतत विकास से संबंधित महत्वपूर्ण कार्यक्रम।
  7. सतत विकास = वर्तमान की जरूरत + भविष्य की सुरक्षा।
  8. विकसित देशों और विकासशील देशों में ऐतिहासिक जिम्मेदारी को लेकर मतभेद।
  9. CBDR = Common but Differentiated Responsibilities — साझी लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियाँ।
  10. भारत का जोर पर्यावरण संरक्षण + विकास के अधिकार + न्यायपूर्ण जिम्मेदारी पर रहा है।

सबसे महत्वपूर्ण संभावित प्रश्न

“साझी लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों से आप क्या समझते हैं?”
“रियो पृथ्वी सम्मेलन 1992 का क्या महत्व है?”
“सतत विकास क्या है?”
“वैश्विक साझी संपदा क्या है?”
“विकसित और विकासशील देशों में पर्यावरण को लेकर विवाद क्यों है?”
“प्राकृतिक संसाधनों को लेकर संघर्ष क्यों होते हैं?”
“पर्यावरण विश्व राजनीति का विषय क्यों बन गया है?”